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प्रार्थना का प्रभाव

सन् 1956 में मद्रास इलाके में अकाल पड़ा। पीने का पानी मिलना भी दुर्लभ हो गया। वहाँ का तालाब ‘रेड स्टोन लेक’ भी सूख गया। लोग त्राहिमाम् पुकार उठे। उस समय के मुख्यमंत्री सी. राजगोपालाचारी ने धार्मिक जनता से अपील की कि ‘सभी लोग सागर तट पर एकत्रित होकर प्रार्थना करें।’

सभी समुद्र तट पर एकत्रित हुए। किसी ने जप किया तो किसी ने गीता का पाठ, किसी ने रामायण की चौपाइयाँ गुंजायी तो किसी ने अपनी भावना के अनुसार अपने इष्टदेव की प्रार्थना की।

मुख्यमंत्री ने सच्चे हृदय से, गदगद कंठ से वरुणदेव, इन्द्रदेव और सबमें बसे हुए आदिनारायण विष्णुदेव की प्रार्थना की। लोग प्रार्थना करके शाम को घर पहुँचे। वर्षा का मौसम तो कब का बीत चुका था। बारिश का कोई नामोनिशान नहीं दिखाई दे रहा था। ‘आकाश मे बादल तो रोज आते और चले जाते हैं।’

ऐसा सोचते-सोचते सब लोग सो गये। रात को दो बजे मूसलाधार बरसात ऐसी बरसी, ऐसी बरसी कि ‘रेड स्टोन लेक’ पानी से छलक उठा। बारिश तो चलती ही रही। यहाँ तक कि मद्रास सरकार को शहर की सड़कों पर नावें चलानी पड़ीं। दृढ़ विश्वास, शुद्ध भाव, भगवन्नाम, भगवत्प्रार्थना छोटे-से-छोटे व्यक्ति को भी उन्नत करने में सक्षम है। महात्मा गाँधी भी गीता के पाठ, प्रार्थना और रामनाम के स्मरण से विघ्न-बाधाओं को चीरते हुए अपने महान उद्देश्य में सफल हुए, यह दुनिया जानती है।

आज विश्व कोरोना महामारी से जूझ रहा है लेकिन आध्यात्मिक देश भारत अब पहले की अपेक्षा और अधिक धर्मनिरपेक्ष हो चुका है आज सी. राजगोपालचारी जैसा कोई नेता भी नहीं जो जनता से ऐसा आह्वाहन भी कर सके।

लेकिन हमें ध्यान रखना है अपने उस स्वर्णिम अतीत का जिसमें प्रार्थना के दम पर स्त्री अपने मृत पति को जीवित कर देती है। जहां भगवान भी ‘भक्त के वश में’ रहते हैं।