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आरती का अर्थ, विधि तथा महत्व

आरती : व्याकुल होकर भगवान को याद करना, स्तवन करना।

आरती, पूजा के अंत में धूप, दीप, कर्पूर से की जाती है। इसके बिना पूजा अधूरी मानी जाती है। हिंदू धर्म में अग्नि को शुद्ध माना गया है। पूजा के अंत में जलती हुई लौ को आराध्य देव के सामने एक विशेष विधि से घुमाया जाता है।

इसमें इष्टदेवता की प्रसन्नता के लिए दीपक दिखाने के साथ ही उनका स्तवन और गुणगान भी किया जाता है। यह उपासक के हृदय में भक्ति दीप प्रज्वलित करने और ईश्वर का आशीर्वाद ग्रहण करने का सुलभ माध्यम है।

आरती चार प्रकार की होती है –

  • दीप आरती
  • जल आरती
  • धूप, कपूर, अगरबत्ती से आरती
  • पुष्प आरती

दीप आरती : दीपक लगाकर आरती का आशय है, हम संसार के लिए प्रकाश की प्रार्थना करते हैं।

जल आरती: जल जीवन का प्रतीक है। आशय है कि हम जीवन रूपी जल से भगवान की आरती करते हैं।

धूप, कपूर, अगरबत्ती से आरती : धूप, कपूर और अगरबत्ती सुगंध का प्रतीक है। यह वातावरण को सुगंधित करते हैं तथा हमारे मन को भी प्रसन्न करते हैं।

पुष्प आरती : पुष्प सुंदरता और सुगंध का प्रतीक है। अन्य कोई साधन न होने पर पुष्प से भी आरती की जाती है।

आरती एक विज्ञान है। आरती के साथ – साथ ढोल, नगाड़े, तुरही, शंख, घंटा आदि वाद्य भी बजते हैं। इन वाद्यों की ध्वनि से रोगाणुओं का नाश होता है। वातावरण पवित्र होता है। दीपक और धूप की सुगंध से चारों ओर सुगंध का फैलाव होता है। पर्यावरण सुगंध से भर जाता है।

आरती के पश्चात मंत्रों द्वारा हाथों में फूल लेकर भगवान को पुष्प समर्पित किए जाते हैं तथा प्रार्थना की जाती है। पूजा में आरती का इतना महत्व क्यों हैं इसका जवाब स्कंद पुराण में मिलता है। पुराण में कहा गया है कि अगर कोई व्यक्ति मंत्र नहीं जानता पूजा की विधि नहीं जानता लेकिन सिर्फ आरती कर लेता है तो भगवान उसकी पूजा को पूर्ण रूप से स्वीकार कर लेते हैं।

आरती करते हुए भक्त के मन में ऐसी भावना होनी चाहिए, मानो वह पंच-प्राणों की सहायता से ईश्वर की आरती उतार रहा हो। घी की ज्योति जीव के आत्मा की ज्योति का प्रतीक मानी जाती है। यदि भक्त अंतर्मन से ईश्वर को पुकारते हैं, तो यह पंचारती कहलाती है। आरती प्रायः दिन में एक से पांच बार की जाती है। इसे हर प्रकार के धार्मिक समारोह एवं त्यौहारों में पूजा के अंत में करते हैं।

आरती करने का समय :

  1. मंगला आरती – यह आरती भगवान् को सूर्योदय से पहले उठाते समय करनी चाहिए।
  2. शृंगार आरती – यह आरती भगवान् जी की पूजा करने के बाद करनी चाहिए।
  3. राजभोग आरती – यह आरती दोपहर को भोग लगाते समय करनी चाहिए और भगवान् जी की आराम की व्यवस्था कर देनी चाहिए।
  4. संध्या आरती – यह आरती शाम को भगवान् जी को उठाते समय करनी चाहिए।
  5. शयन आरती – यह आरती भगवान् जी को रात्री में सुलाते समय करनी चाहिए।

एक पात्र में शुद्ध घी लेकर उसमें विषम संख्या (जैसे 3, 5 या 7) में बत्तियां जलाकर आरती की जाती है। इसके अलावा कपूर से भी आरती कर सकते हैं। सामान्य तौर पर पांच बत्तियों से आरती की जाती है, जिसे पंच प्रदीप भी कहते हैं।

आरती पांच प्रकार से की जाती है। पहली दीपमाला से, दूसरी जल से भरे शंख से, तीसरी धुले हुए वस्त्र से, चौथी आम और पीपल आदि के पत्तों से और पांचवीं साष्टांग अर्थात शरीर के पांचों भाग (मस्तिष्क, हृदय, दोनों कंधे, हाथ व घुटने) से।

पंच-प्राणों की प्रतीक आरती मानव शरीर के पंच-प्राणों की प्रतीक मानी जाती है

आरती की थाली या दीपक को ईष्ट देव की मूर्ति के समक्ष ऊपर से नीचे, गोलाकार घुमाया जाता है। इसे घुमाने की एक निश्चित संख्या भी हो सकती है व गोले के व्यास भी कई हो सकते हैं। इसके साथ आरती गान भी समूह द्वारा गाया जाता है (कई जगह गान गाने का विधान नहीं मिलता)। जिसको संगीत आदि की संगत भी दी जाती है। आरती होने के बाद पंडित या आरती करने वाला आरती के दीपक को उपस्थित भक्त-समूह में घुमाता है, लोग अपने दोनों हाथों को नीचे को उलटा कर जोड़ लेते हैं व आरती पर घुमा कर अपने मस्तक को लगाते हैं। इसके दो कारण बताये जाते हैं।

एक मान्यता के अनुसार ईश्वर की शक्ति उस आरती में समा जाती है, जिसका अंश भक्त मिल कर अपने अपने मस्तक पर ले लेते हैं। दूसरी मान्यता के अनुसार ईश्वर की नजर उतारी जाती है, या बलाएं ली जाती हैं व भक्तजन उसे इस प्रकार अपने ऊपर लेने की भावना करते हैं, जिस प्रकार एक मां अपने बच्चों की बलाएं ले लेती है। ये सांकेतिक होता है, असल में जिसका उद्देश्य ईश्वर के प्रति अपना समर्पण व प्रेम जताना होता है।