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दायित्व, पुण्य और धर्म


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पिछले दिनों की बात है, कोरोना लॉकडाउन के समय एक सज्जन से बातों के बीच पता चला था कि उन्होंने कितने लोगों की मदद की, कितना खर्च किया था। बड़ी बात यह रही कि उन्होंने इसे समाज के प्रति अपना दायित्व बताया था।

दूसरी तरफ अभी कल की ही बात है जब उसी सज्जन से जानकारी मिली कि उन्होंने कितना बड़ा ‘पुण्य’ का काम किया है, अपने क्षेत्र के शिव मंदिर को भव्य रूप दे कर।

आज बहुत लोग ‘पुण्य’ और ‘दायित्व’ को ठीक से नहीं समझ रहे हैं। विचार आया आप सभी से साझा करूं।

एक बार एक अजनबी किसी के घर गया। वह अंदर गया और मेहमान कक्ष में बैठ गया।

वह खाली हाथ आया था तो उसने सोचा कि कुछ उपहार देना अच्छा रहेगा तो उसने वहीं पर टँगी एक पेन्टिंग उतारी और जब घर का मालिक आया, उसने पेन्टिंग देते हुए उससे कहा, ‘यह मैं आपके लिए लाया हूँ।’

घर का मालिक जिसे पता था कि यह मेरी चीज मुझे ही भेंट दे रहा है, सन्न रह गया।

अब आप ही बताएं कि क्या वह भेंट पा कर जो कि पहले से ही उसकी है, उस आदमी को खुश होना चाहिए? खुश होगा या हो सकता है क्या? लेकिन यही चीज हम भगवान के साथ करते हैं।

हम उन्हें रूपया, पैसा, वस्तु आदि चढ़ाते हैं और हर चीज जो उनकी ही बनाई है, उन्हें ही भेंट करते हैं और सोचते हैं कि कितना बड़ा पुण्य का काम किया है।

वास्तव में यह हमारा “दायित्व” है। भगवान के मंदिर में दिव्यता दिखे। पुजारी, सेवक आदि का परिवार सुचारू रूप से चले और वे धार्मिक कथाओं और उपदेशों को सभी तक पहुचा सकें जिससे समाज का कल्याण हो सके।

जिस प्रकार घर-परिवार के प्रति हमारा दायित्व है उसी प्रकार मंदिर, मठ और भगवान के प्रति भी हमारा दायित्व है, उनकी सेवा, सुश्रुषा, पूजा, पाठ, यह सभी हमारा दायित्व है, यह स्वैच्छिक नहीं अनिवार्य है।

घर के दो मंजिले पर एक्स्ट्रा दो कमरे बनवाने से अच्छा है कि वह धन “राम मंदिर” को मंदिर निर्माण हेतु दिए जाएं और, समाज के प्रति किया गया कार्य “पुण्य” है, यही वह पुण्य है जिससे व्यक्ति पुण्यात्मा कहलाता है, स्वर्ग नर्क अर्थात कर्मफल का निर्धारण होता है।

“दायित्व” और “पुण्य” इन दोनों को सुचारू रूप से करना ही “धर्म” कहलाता है। आप धार्मिक तभी हो सकते हैं जब अपने ‘दायित्व’ और ‘पुण्य’, इन दोनों कर्मों को ठीक-ठीक समझें और उनका निर्वहन करें।