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चरणामृत और पंचामृत

चरणामृत :

तांबे के बर्तन में चरणामृत रूपी जल रखने से उसमें तांबे के औषधीय गुण आ जाते हैं। चरणामृत में तुलसीदल, तिल और दूसरे औषधीय तत्व मिले होते हैं। मंदिर या घर में तांबे के लोटे में तुलसी मिला जल रखते हैं।

चरणामृत लेने के नियम :

चरणामृत ग्रहण करने के बाद बहुत से लोग सिर पर हाथ फेरते हैं लेकिन ऐसा नहीं करना चाहिए। इससे नकारात्मक प्रभाव बढ़ता है। चरणामृत हमेशा दाएं हाथ से लेना चाहिए और श्रद्धा भक्तिपूर्वक मन को शांत रखकर ग्रहण करना चाहिए। इससे चरणामृत अधिक लाभप्रद होता है।

चरणामृत का लाभ :

आयुर्वेद की दृष्टि से चरणामृत स्वास्थ्य के लिए बहुत ही अच्छा माना गया है। आयुर्वेद के अनुसार तांबे में अनेक रोगों को नष्ट करने की क्षमता होती है। यह पौरूष शक्ति को बढ़ाने में भी गुणकारी माना जाता है। तुलसी के रस से कई रोग दूर हो जाते हैं और इसका जल मस्तिष्क को शांति और निश्चिंतता प्रदान करता हैं।

स्वास्थ्य लाभके साथ ही साथ चरणामृत बुद्धि, स्मरण शक्ति को बढ़ाने में भी कारगर होता है।

अब बात करते हैं “पंचामृत” की :

पंचामृत का अर्थ है ‘पांच अमृत’। दूध, दही, घी, शहद और शक्कर को मिलाकर पंचामृत बनाया जाता है। इसी से भगवान का अभिषेक भी किया जाता है। पांचों प्रकार के मिश्रण से बनने वाला पंचामृत कई रोगों में लाभ – दायक और मन को शांति प्रदान करने वाला होता है। इसका एक आध्यात्मिक पहलू भी है।

वह यह कि पंचामृत आत्मोन्नति का 5 प्रतीक है।

  • दूध – दूध पंचामृत का प्रथम भाग है। यह शुभ्रता का प्रतीक है, अर्थात हमारा जीवन दूध की तरह निष्कलंक होना चाहिए।
  • दही – दही का गुण है कि यह दूसरों को अपने जैसा बनाता है। दही चढ़ाने का अर्थ यही है कि पहले हम निष्कलंक हो सद्गुण अपनाएं और दूसरों को भी अपने जैसा बनाएं।
  • घी – घी स्निग्धता और स्नेह का प्रतीक है। सभी से हमारे स्नेहयुक्त संबंध हो, यही भावना है।
  • शहद – शहद मीठा होने के साथ ही शक्तिशाली भी होता है। निर्बल व्यक्ति जीवन में कुछ नहीं कर सकता, तन और मन से शक्तिशाली व्यक्ति ही सफलता पा सकता है। “पहला धन, निरोगी काया”।
  • शक्कर – शक्कर का गुण है मिठास, शक्कर चढ़ाने का अर्थ है जीवन में मिठास घोलें। मीठा बोलना सभी को अच्छा लगता है और इससे मधुर व्यवहार बनता है।

उपरोक्त गुणों से जीवन में सफलता हमारे कदम चूमती है।

पंचामृत के लाभ :

पंचामृत का सेवन करने से शरीर पुष्ट और रोगमुक्त रहता है। पंचामृत से जिस तरह हम भगवान को स्नान कराते हैं, यदि ऐसा ही स्वयं स्नान करें तो शरीर की कांति बढ़ती भी है। पंचामृत उसी मात्रा में सेवन करना चाहिए, जिस मात्रा में किया जाता है, उससे ज्यादा नहीं।